HI/Prabhupada 0797 जो कृष्णकी ओर से, लोगोंको उपदेश दे रहे हैं, कृष्ण भावनामृतको अपनाने के लिए, वे महान सैनिक है: Difference between revisions

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गुरु का अर्थ है... यह श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा समझाया गया है कि कैसे बहुत आसानी से गुरु बना जा सकता है । उन्होंने सब से कहा, विशेष रूप से जो भारत में पैदा हुए हैं, भारत भुमिते मनुष्य जन्म हैल यार ([[Vanisource:CC Adi 9.41|चैतन्य चरितामृत अादि ९.४१]]) । विशेष रूप से । क्योंकि हम भारतीय, हमारे पास सुविधा है पूरे दुनिया का गुरु बनने की । हमे सुविधा मिली है । क्योंकि यहाँ हमारे पास शास्त्र हैं, वैदिक शास्त्र, विशेष रूप से भगवद गीता, जो कृष्ण द्वारा स्वयं बोली गई है । अगर समझने की कोशिश करते हैं कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है और दुनिया भर में प्रचार करते हैं, तो तुम गुरु बन जाते हो । और अगर हम दूसरों को धोखा देना चाहते हैं तथाकथित योगी, स्वामी, विद्वान के नाम पर, तो यह तुम्हे गुरु नहीं बनाएगा ।  
गुरु का अर्थ है... यह श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा समझाया गया है कि कैसे बहुत आसानी से गुरु बना जा सकता है । उन्होंने सब से कहा, विशेष रूप से जो भारत में पैदा हुए हैं, भारत भुमिते मनुष्य जन्म हैल यार ([[Vanisource:CC Adi 9.41|चैतन्य चरितामृत अादि ९.४१]]) । विशेष रूप से । क्योंकि हम भारतीय, हमारे पास सुविधा है पूरे दुनिया का गुरु बनने की । हमे सुविधा मिली है । क्योंकि यहाँ हमारे पास शास्त्र हैं, वैदिक शास्त्र, विशेष रूप से भगवद गीता, जो कृष्ण द्वारा स्वयं बोली गई है । अगर समझने की कोशिश करते हैं कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है और दुनिया भर में प्रचार करते हैं, तो तुम गुरु बन जाते हो । और अगर हम दूसरों को धोखा देना चाहते हैं तथाकथित योगी, स्वामी, विद्वान के नाम पर, तो यह तुम्हे गुरु नहीं बनाएगा ।  


गुरु... चैतन्य महाप्रभु कहते हैं तुम बनो, सभी भारतीय, सभी भारतीय, गुरु बनो । अामार अाज्ञाय गुरु हया तार एइ देश ([[Vanisource:CC Madhya 7.128|चैतन्य चरितामृत मध्य ७.१२८]]) । जहाँ भी तुम हो । और मैं कैसे गुरु बन सकता हूँ ? यारे देख तारे कह कृष्ण उपदेश । बस । तो यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन का मतलब है चैतन्य महाप्रभु के निर्देश का पालन करना । और चैतन्य महाप्रभु का निर्देश यह है, कृष्ण-उपदेश का प्रचार करना । और यह कृष्ण उपदेश है: न माम दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: ([[Vanisource:BG 7.15 (1972)|भ.गी. ७.१५]]) |  
गुरु... चैतन्य महाप्रभु कहते हैं तुम बनो, सभी भारतीय, सभी भारतीय, गुरु बनो । अामार अाज्ञाय गुरु हया तार एइ देश ([[Vanisource:CC Madhya 7.128|चैतन्य चरितामृत मध्य ७.१२८]]) । जहाँ भी तुम हो । और मैं कैसे गुरु बन सकता हूँ ? यारे देख तारे कह कृष्ण उपदेश । बस । तो यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन का मतलब है चैतन्य महाप्रभु के निर्देश का पालन करना । और चैतन्य महाप्रभु का निर्देश यह है, कृष्ण-उपदेश का प्रचार करना । और यह कृष्ण उपदेश है: न माम दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: ([[HI/BG 7.15|भ.गी. ७.१५]]) |  


ये हमारे निर्मित शब्द नहीं है; यह कृष्ण-उपदेश है, कि "जो मेरे प्रति आत्मसमर्पित नहीं है, दुष्कृतिन, वह तुरंत चार समूहों में वर्गीकृत होते है ।" वे क्या हैं ? दुष्कृतिन, मूढा:, नराधमा:, माययापहृत-ज्ञाना, अासुरम भावम अाश्रित: | तो यह एक बहुत ही साधारण बात है । एक मूढ कौन है ? अगर वह कृष्ण के प्रति समर्पित नहीं है, अगर वह समझता नहीं है कि कृष्ण क्या हैं, वह या तो दुष्कृतिन मतलब पापी; मूढ, धूर्त; नराधमा, मानव जाति में सबसे नीच; और माययापहृत - ज्ञाना, और उसकी तथाकथित शिक्षा और डिग्री बेकार है क्योंकि वास्तविक ज्ञान उससे ले लिया जाता है । माययापहृत-ज्ञाना ।  
ये हमारे निर्मित शब्द नहीं है; यह कृष्ण-उपदेश है, कि "जो मेरे प्रति आत्मसमर्पित नहीं है, दुष्कृतिन, वह तुरंत चार समूहों में वर्गीकृत होते है ।" वे क्या हैं ? दुष्कृतिन, मूढा:, नराधमा:, माययापहृत-ज्ञाना, अासुरम भावम अाश्रित: | तो यह एक बहुत ही साधारण बात है । एक मूढ कौन है ? अगर वह कृष्ण के प्रति समर्पित नहीं है, अगर वह समझता नहीं है कि कृष्ण क्या हैं, वह या तो दुष्कृतिन मतलब पापी; मूढ, धूर्त; नराधमा, मानव जाति में सबसे नीच; और माययापहृत - ज्ञाना, और उसकी तथाकथित शिक्षा और डिग्री बेकार है क्योंकि वास्तविक ज्ञान उससे ले लिया जाता है । माययापहृत-ज्ञाना ।  
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:न च तस्मान मनुष्येषु  
:न च तस्मान मनुष्येषु  
:कश्चिन मे प्रिय-कृत्तम:  
:कश्चिन मे प्रिय-कृत्तम:  
:([[Vanisource:BG 18.69 (1972)|भ.गी. १८.६९]])
:([[HI/BG 18.69|भ.गी. १८.६९]])


:य इदम परमम गुह्यम  
:य इदम परमम गुह्यम  
:मद-भक्तेषु अभिधास्यति  
:मद-भक्तेषु अभिधास्यति  
:([[Vanisource:BG 18.68 (1972)|भ.गी. १८.६८]])
:([[HI/BG 18.68|भ.गी. १८.६८]])


तो अगर तुम सामना करते हो... जैसे सिपाही, वे देश के लिए खतरे का सामना कर रहे हैं । वे पहचाने जाते हैं । इसी तरह, जो प्रचारक हैं - कृष्ण की ओर से, उपदेश दे रहे हैं, लोगों को, कृष्ण भावनामृत को अपनाने के लिए, वे महान सैनिक हैं । इसलिए मैं बहुत खुश हूँ कि तुम यूरोपी और अमेरिकी, विशेष रूप से, तुम मेरी मदद कर रहे हो । तो इस प्रक्रिया को जारी रखो, और यह बहुत ही आसान तरीका है कृष्ण द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए । क्योंकि वे कहते हैं न च तस्मान मनुष्येषु कश्चिन मे प्रिय-कृत्तम: ([[Vanisource:BG 18.69 (1972)|भ.गी. १८.६९]]) | कौन ? कौन यह कृष्ण भावनामृत का प्रचार कर रहा है । तो मैं आपको बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ कि तुम वृन्दावन में यहाँ आए हो अौर तुम प्रचार कर रहे हो, यात्रा कर रहे हो । तो चलो ये एक जीवन को समर्पित करे दुनिया भर में कृष्ण भावनामृत के प्रचार के लिए | और कोई बात नहीं अगर हम प्रचार करते हुए मर जाते हैं । फिर भी, यह शानदार होगा । बहुत बहुत धन्यवाद। भक्त: जय!  
तो अगर तुम सामना करते हो... जैसे सिपाही, वे देश के लिए खतरे का सामना कर रहे हैं । वे पहचाने जाते हैं । इसी तरह, जो प्रचारक हैं - कृष्ण की ओर से, उपदेश दे रहे हैं, लोगों को, कृष्ण भावनामृत को अपनाने के लिए, वे महान सैनिक हैं । इसलिए मैं बहुत खुश हूँ कि तुम यूरोपी और अमेरिकी, विशेष रूप से, तुम मेरी मदद कर रहे हो । तो इस प्रक्रिया को जारी रखो, और यह बहुत ही आसान तरीका है कृष्ण द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए । क्योंकि वे कहते हैं न च तस्मान मनुष्येषु कश्चिन मे प्रिय-कृत्तम: ([[HI/BG 18.69|भ.गी. १८.६९]]) | कौन ? कौन यह कृष्ण भावनामृत का प्रचार कर रहा है । तो मैं आपको बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ कि तुम वृन्दावन में यहाँ आए हो अौर तुम प्रचार कर रहे हो, यात्रा कर रहे हो । तो चलो ये एक जीवन को समर्पित करे दुनिया भर में कृष्ण भावनामृत के प्रचार के लिए | और कोई बात नहीं अगर हम प्रचार करते हुए मर जाते हैं । फिर भी, यह शानदार होगा । बहुत बहुत धन्यवाद। भक्त: जय!  
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Arrival Address -- Vrndavana, September 3, 1976

प्रभुपाद: वैदिक ज्ञान श्रुति है । वैदिक ज्ञान को तथाकथित सांसारिक छात्रवृत्ति, व्याकरण पढ़कर, समझना नहीं जा सकता है । नहीं । वैदिक ज्ञान वह व्यक्ति द्वारा समझा जा सकता है, जिसका सदाशयी गुरु में पूर्ण विश्वास है । गुरू मतलब कृष्ण के प्रतिनिधि - कृष्ण और उनके प्रतिनिधि । हमने बार बार इस तथ्य पर चर्चा की है कि गुरु का मतलब है कृष्ण का सदाशयी सेवक । गुरु का मतलब नहीं है एक जादूगर या मायाजाल । यह गुरु नहीं है ।

गुरु का अर्थ है... यह श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा समझाया गया है कि कैसे बहुत आसानी से गुरु बना जा सकता है । उन्होंने सब से कहा, विशेष रूप से जो भारत में पैदा हुए हैं, भारत भुमिते मनुष्य जन्म हैल यार (चैतन्य चरितामृत अादि ९.४१) । विशेष रूप से । क्योंकि हम भारतीय, हमारे पास सुविधा है पूरे दुनिया का गुरु बनने की । हमे सुविधा मिली है । क्योंकि यहाँ हमारे पास शास्त्र हैं, वैदिक शास्त्र, विशेष रूप से भगवद गीता, जो कृष्ण द्वारा स्वयं बोली गई है । अगर समझने की कोशिश करते हैं कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है और दुनिया भर में प्रचार करते हैं, तो तुम गुरु बन जाते हो । और अगर हम दूसरों को धोखा देना चाहते हैं तथाकथित योगी, स्वामी, विद्वान के नाम पर, तो यह तुम्हे गुरु नहीं बनाएगा ।

गुरु... चैतन्य महाप्रभु कहते हैं तुम बनो, सभी भारतीय, सभी भारतीय, गुरु बनो । अामार अाज्ञाय गुरु हया तार एइ देश (चैतन्य चरितामृत मध्य ७.१२८) । जहाँ भी तुम हो । और मैं कैसे गुरु बन सकता हूँ ? यारे देख तारे कह कृष्ण उपदेश । बस । तो यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन का मतलब है चैतन्य महाप्रभु के निर्देश का पालन करना । और चैतन्य महाप्रभु का निर्देश यह है, कृष्ण-उपदेश का प्रचार करना । और यह कृष्ण उपदेश है: न माम दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: (भ.गी. ७.१५) |

ये हमारे निर्मित शब्द नहीं है; यह कृष्ण-उपदेश है, कि "जो मेरे प्रति आत्मसमर्पित नहीं है, दुष्कृतिन, वह तुरंत चार समूहों में वर्गीकृत होते है ।" वे क्या हैं ? दुष्कृतिन, मूढा:, नराधमा:, माययापहृत-ज्ञाना, अासुरम भावम अाश्रित: | तो यह एक बहुत ही साधारण बात है । एक मूढ कौन है ? अगर वह कृष्ण के प्रति समर्पित नहीं है, अगर वह समझता नहीं है कि कृष्ण क्या हैं, वह या तो दुष्कृतिन मतलब पापी; मूढ, धूर्त; नराधमा, मानव जाति में सबसे नीच; और माययापहृत - ज्ञाना, और उसकी तथाकथित शिक्षा और डिग्री बेकार है क्योंकि वास्तविक ज्ञान उससे ले लिया जाता है । माययापहृत-ज्ञाना ।

तो लड़ने की कोई जरूरत नहीं है... लेकिन हम समझ सकते हैं कि सामान्य रूप में ये लोग क्या हैं । वे पुरुषों के इन चार समूहों के भीतर हैं । तो हमें उनका सामना करना पड़ता है । हमारा कृष्ण भावनामृत आंदोलन, इन धूर्तों का सामना कर रहा है, ये दुष्कृतिन, ये नराधमा, और उन्हें अनुरोध करने के लिए कृष्ण भावनाभावित बनने के लिए । यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन है । तुम अपनी महानता नहीं दिखा सकते हो एकांत में बैठ कर अालस्य से, हरिदास ठाकुर की नकल करते हुए: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण । नहीं । तुम्हे प्रचार करना होगा । यह चैतन्य महाप्रभु का आदेश है ।

अामार अज्ञाय गुरु हया तार एइ देश
(चैतन्य चरितामृत मध्य ७.१२८) ।

यही वास्तव में चैतन्य महाप्रभु का अनुसरण है । न की हरिदास ठाकुर की नकल करना । यह संभव नहीं है । तुम कर सकते हो... तुम वह भी बहुत अच्छी तरह से करो, यह तुम्हारी सुरक्षा के लिए है । मान लो तुम अच्छी तरह से कर रहे हो, लेकिन वह तुम्हारी सुरक्षा है । लेकिन जो दूसरों के हित के लिए खतरनाक स्थिति का सामना करते हैं, वे बहुत जल्दी कृष्ण द्वारा मान्यता प्राप्त करते हैं ।

न च तस्मान मनुष्येषु
कश्चिन मे प्रिय-कृत्तम:
(भ.गी. १८.६९)
य इदम परमम गुह्यम
मद-भक्तेषु अभिधास्यति
(भ.गी. १८.६८)

तो अगर तुम सामना करते हो... जैसे सिपाही, वे देश के लिए खतरे का सामना कर रहे हैं । वे पहचाने जाते हैं । इसी तरह, जो प्रचारक हैं - कृष्ण की ओर से, उपदेश दे रहे हैं, लोगों को, कृष्ण भावनामृत को अपनाने के लिए, वे महान सैनिक हैं । इसलिए मैं बहुत खुश हूँ कि तुम यूरोपी और अमेरिकी, विशेष रूप से, तुम मेरी मदद कर रहे हो । तो इस प्रक्रिया को जारी रखो, और यह बहुत ही आसान तरीका है कृष्ण द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए । क्योंकि वे कहते हैं न च तस्मान मनुष्येषु कश्चिन मे प्रिय-कृत्तम: (भ.गी. १८.६९) | कौन ? कौन यह कृष्ण भावनामृत का प्रचार कर रहा है । तो मैं आपको बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ कि तुम वृन्दावन में यहाँ आए हो अौर तुम प्रचार कर रहे हो, यात्रा कर रहे हो । तो चलो ये एक जीवन को समर्पित करे दुनिया भर में कृष्ण भावनामृत के प्रचार के लिए | और कोई बात नहीं अगर हम प्रचार करते हुए मर जाते हैं । फिर भी, यह शानदार होगा । बहुत बहुत धन्यवाद। भक्त: जय!