Please join, like or share our Vanipedia Facebook Group
Go to Vaniquotes | Go to Vanisource | Go to Vanimedia


Vanipedia - the essence of Vedic knowledge

HI/690611b प्रवचन - श्रील प्रभुपाद नई वृन्दावन में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं

From Vanipedia

Nectar Drops from Srila Prabhupada
एक भक्त, उसे जबरदस्ती नहीं करनी पड़ती है, जैसे चिकित्सक उससे कहता है, "ऐसा मत करो ।" वह स्वचालित रूप से ऐसा करता है । क्यों ? परम द्रष्ट्वा निवर्तन्ते: उसने देखा है या उसने कुछ बेहतर स्वाद चखा है, जिससे वह इस घृणित स्वाद को और अधिक लेना पसंद नहीं करता । वह है भक्ति: परेशानु... इसका मतलब है कि जब हमारी रूचि घृणास्पद चीज़ो से चली जाती है, तो हमें पता होना चाहिए कि हम कृष्ण भावनामृत में आगे बढ़ रहे हैं । परीक्षण आपके हाथ में है । आपको किसी से पूछना नहीं है, "क्या आपको लगता है कि मैं कृष्ण भावनामृत में आगे बढ़ रहा हूं ?" लेकिन आप समझ सकते हैं । बिल्कुल वैसे ही: यदि आप भूखे हैं और यदि आप खा रहे हैं, तो आप जानते हैं, खाने से, कैसे आपकी भूख की संतुष्टी हो रही है, आप कितनी ताकत महसूस कर रहे हैं, आप कितना आनंद महसूस कर रहे हैं । आपको किसी से भी पूछना नहीं है । इसी प्रकार, अगर कोई व्यक्ति अपना कृष्ण भावनामृत बढ़ाता है, तो परीक्षण होगा कि वह सभी भौतिक चीजों में से रूचि खो देगा ।
690611 - प्रवचन श्री.भा. १.५.१२ - न्यू वृन्दावन - अमरीका