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HI/690622 प्रवचन - श्रील प्रभुपाद नई वृन्दावन में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं

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Nectar Drops from Srila Prabhupada
तो श्रीमद-भागवतम का विधान कि तल लभ्यते दुःखवद अन्यतः सुखम (श्री.भा. १.५.१८) । आप तथाकथित आर्थिक विकास की कोशिश मत करो । आप जो हासिल करने के लिए नियत हैं उससे अधिक नहीं पा सक्ते । यह पहले से ही तय हो चुका है । सभी जीव को विभिन्न प्रकार के जीवन का स्तर प्राप्त होता है, जो की आधारित है पिछले कर्म के अनुसार, दैवेन, दैव-नेत्रेण (श्री.भा. ३.३१.१), कर्मणा । तो आप इसे बदल नहीं सकते । वह प्रकृति के नियम, आप नहीं बदल सकते । क्यों ये जीवन की किस्में है, स्थिति की किस्में, कार्य की किस्में । यह निर्धारित है । विषय: खलु सर्वतः स्यात (श्री.भा. ११.९.२९) । विषय, इन भौतिक आनंद का मतलब है खाना, सोना, संभोग करना और बचाव करना... केवल मानक अलग है । मैं कुछ खा रहा हूं, आप कुछ खा रहे हैं । शायद, मेरी गणना में, आप बहुत अच्छा नहीं खा रहे हैं । आपकी गणना में मैं बहुत अच्छा नहीं खा रहा हूं । लेकिन खाना वही है । आप खा रहे हो । मैं खा रहा हूँ । तो भौतिक संसार में सुख का स्तर, बुनियादी सिद्धांत पे, यह सब वही है । लेकिन हमने बनाया है, 'यह अच्छा मानक है । वह खराब मानक है । यह बहुत अच्छा है । यह बहुत बुरा है' ।
690622 - प्रवचन श्री.भा. १.५.१८ - न्यू वृन्दावन - अमरीका