HI/BG 2.18

His Divine Grace A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupāda


श्लोक 18

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥१८॥

शब्दार्थ

अन्त-वन्त:—नाशवान; इमे—ये सब; देहा:—भौतिक शरीर; नित्यस्य—नित्य स्वरूप; उक्ता:—कहे जाते हैं; शरीरिण:—देहधारी जीव का; अनाशिन:—कभी नाश न होने वाला; अप्रमेयस्य—न मापा जा सकने योग्य; तस्मात्—अत:; युध्यस्व—युद्ध करो; भारत—हे भरतवंशी।

अनुवाद

अविनाशी, अप्रमेय तथा शाश्र्वत जीव के भौतिक शरीर का अन्त अवश्यम्भावी है | अतः हे भारतवंशी! युद्ध करो |

तात्पर्य

भौतिक शरीर स्वभाव से नाशवान है | यह तत्क्षण नष्ट हो जाता है और सौ वर्ष बाद भी | यह केवल समय की बात है | इसे अनन्त काल तक बनाये रखने की कोई सम्भावना नहीं है | किन्तु आत्मा इतना सूक्ष्म है कि इसे शत्रु देख भी नहीं सकता, मारना तो दूर रहा | जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया है, यह इतना सूक्ष्म है कि कोई इसके मापने की बात सोच भी नहीं सकता | अतः दोनों ही दृष्टि से शोक का कोई कारण नहीं है क्योंकि जीव जिस रूप में है, न तो उसे मारा जा सकता है, न ही शरीर को कुछ समय तक या स्थायी रूप से बचाया जा सकता है | पूर्ण आत्मा के सूक्ष्म कण अपने कर्म के अनुसार ही यह शरीर धारण करते हैं, अतः धार्मिक नियमों का पालन करना चाहिए | वेदान्त-सूत्र में जीव को प्रकाश बताया गया है क्योंकि वह परम प्रकाश का अंश है | जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सारे ब्रह्माण्ड का पोषण करता है उसी प्रकार आत्मा के प्रकाश से इस भौतिक देह का पोषण होता है | जैसे ही आत्मा इस भौतिक शरीर से बाहर निकल जाता है, शरीर सड़ने लगता है, अतः आत्मा ही शरीर का पोषक है | शरीर अपने आप में महत्त्वहीन है | इसीलिए अर्जुन को उपदेश दिया गया कि वह युद्ध करे और भौतिक शारीरिक कारणों से धर्म की बलि न होने दे |