HI/Prabhupada 0374 - भजहू रे मन का तात्पर्य, भाग 1



Purport to Bhajahu Re Mana -- San Francisco, March 16, 1967

भजहू रे मन श्री- नंद-नंदन, अभय-चरणारविन्द रे । भज, भज का मतलब है पूजा; हू, नमस्कार; मन, मन । कवि गोविन्द दास, प्रभु के एक महान दार्शनिक और भक्त, वे प्रार्थना कर रहे हैं । वे अपने मन से अनुरोध कर रहे हैं, क्योंकि मन मित्र है और मन हर किसी का दुश्मन है । अगर कोई अपने मन को प्रशिक्षित कर सकता है, कृष्ण भावनामृत में, तो वह सफल है । अगर वह अपने मन को प्रशिक्षित नहीं कर सकता है, तो जीवन विफल है । इसलिए गोविंद दास, भगवान कृष्ण के एक महान भक्त ... उनका नाम ही सांकेतिक है, गोविंद दास । गोविंद, कृष्ण, और दास का मतलब है नौकर । यह सभी भक्तों का रवैया है । वे हमेशा डालते हैं, प्रत्यय यह दास, मतलब है नौकर ।

तो गोविंद दास प्रार्थना कर रहे हैं, "मेरे प्रिय मन, तुम नंद के बेटे की पूजा करने का प्रयास करो, जो अभय-चरण है, जिसके चरण कमल सुरक्षित हैं । कोई डर नहीं है । " अभय । अभय का मतलब है कोई डर नहीं है, और चरण, चरण का मतलब है चरण कमल । तो अपने मन को सलाह दे रहे हैं, " मेरे प्यारे मन, कृपया, तुम नंद के बेटे के निडर चरण कमलों की पूजा में अपने आप को व्यस्त रखो ।" भजहू रे मन श्री- नंद-नंदन । नंद-नंदन का मतलब है नंद महाराज के एक पुत्र, श्री कृष्ण । और उनके चरण कमल अभय हैं, निडर । तो गोविंद दास, अपने मन से अनुरोध कर रहे हैं, "कृपया कृष्ण के चरण कमलों की दिव्य प्यारी सेवा में तुम लगे रहो ।" जहॉ तक अन्य बातों का सवाल है... और वे यह भी कहते हैं कि दुर्लभ मानव-जनम ।

दुर्लभ का मतलब है प्राप्त करने के लिए जो बहुत दुर्लभ हो । मानव-जन्म का मतलब है यह मनुष्य जीवन । यह एक बहुत लंबे समय के चक्र के बाद आता है । एक मौका दिया जाता है कृष्ण के प्रति जागरूक बनने के लिए ताकि हम जन्म और मृत्यु के चक्र से बाहर निकल सकें । इसलिए वे सलाह देते हैं कि यह जीवन, मनुष्य जीवन, बहुत महत्वपूर्ण है, दुर्लभ । दुर्लभ का मतलब है ... दु: मतलब बड़ी मुश्किल से, और लभ मतलब प्राप्य ।

तो मूर्ख लोग, वे नहीं जानते क्या, कितना महत्वपूर्ण यह मनुष्य जीवन है । वे सिर्फ जानवरों की तरह इन्द्रिय संतुष्टि में बर्बाद कर रहे हैं । तो यह बहुत ही शिक्षाप्रद है कि वे अपने मन को प्रशिक्षण दे रहे हैं कि "तुम भगवान श्री कृष्ण की पूजा में अपने मन को संलग्न करो ।" दर्लभ मानव-जनम-सत-संगे । और मन का यह प्रशिक्षण संभव है केवल अच्छे संग में, सत-संग । सत-संग का मतलब है जो लोग केवल, शत प्रतिशत, संलग्न हैं भगवान की सेवा में । उन्हें सत कहा जाता है । सताम प्रसंगात । भक्तों के सहयोग के बिना, मन को प्रशिक्षित करना असंभव है । यह तथाकथित योग प्रणाली या ध्यान से संभव नहीं है ।

हमें भक्तों के साथ संग करना होगा, नहीं तो यह संभव नहीं है । इसलिए हमनें इस कृष्ण भावनामृत समाज का गठन किया है, ताकि हम इस संग का लाभ उठा सकें । तो गोविंद दास, कवि और भक्त, सलाह दे रहे हैं, दुर्लभ मानव-जनम सत-संगे: "तुम्हे यह बहुत अच्छा, दुर्लभ मानव शरीर मिला है । अब भक्तों के साथ संग करो और कृष्ण के निडर चरण कमलों पर अपने मन को संलग्न करो ।" वे अपने मन से अनुरोध कर रहे हैं । फिर वे जीवन की हताशाजनक स्थिति की अोर इशारा कर रहे हैं । वह क्या है? शीत अातप बात बरिशण ए दिन जामिनी जागि रे । शीत का मतलब है सर्दियॉ । अातप का मतलब है गर्मियॉ, जब चिलचिलाती धूप होती है । शीत अातप बात, ठंड, बरिशण, तेज़ बारिश । तो ये गड़बड़ी हमेशा रहती है । कभी कभी कड़ाके की ठंड । कभी कभी यह भीषण गर्मी । कभी कभी तेज़ बारिश । कभी ये या वो चलता रहता हैं । तो वे कहते हैं शीत अातप बात बरिशण ए दिन जामिनी जागि रे । पूरी दिन और रात, लोग बहुत कड़ी मेहनत कर रहे हैं परवाह किए बिना, कड़ाके की ठंड, गंभीर गर्मी, और तेज़ बारिश, और रात में, रेगिस्तान जाते हुए, समुद्र के नीचे जाते हुए - हर जगह वे इतने व्यस्त हैं ।

शीत अातप बात बरिशण ए दिन जामिनी जागि रे । रात का काम है, और बहुत से अन्य कार्य हैं । तो वे कहते हैं, शीत अातप बात बरिशण ए दिन जामिनी जागि रे । बिफले सेविनु कृपण दुरजन चपल सुख लब लागि रे । "अब, इस कठिन परिश्रम के साथ, मैंने क्या किया है? मैंने कुछ व्यक्तियों की सेवा की है जो बिल्कुल भी अनुकूल नहीं हैं मेरे कृष्ण भावनामृत के प्रति । और मैंनें उनकी सेवा क्यों की है " चपल सुख-लब लागि रे : "चपल, बहुत चंचल सुख । मैं सोचता हूँ कि अगर मेरा छोटा बच्चा मुस्कुराएगा, तो मैं खुश हो जाऊँगा । अगर मेरी पत्नी प्रसन्न होगी, तो मुझे लगता है मैं खुश हूँ । लेकिन ये सब अस्थायी मुस्कुराहट या सुख, वे सभी चपल हैं ।" यही हमें एहसास होना चाहिए । कई अन्य कवि भी हैं, इसी तरह गाया है कि यह ..., यह मन एक रेगिस्तान की तरह है, और यह पानी के महासागरों के पीछे उत्कंठित है ।

एक रेगिस्तान में, अगर एक महासागर को डाल दिया है, तो यह जलमग्न हो सकता है । अौर पानी की बूंद का क्या लाभ प्राप्त हो सकता है? इसी तरह, हमारा मन, हमारी चेतना, खुशी के सागर के पीछे उत्कंठित है । और परिवार के जीवन में यह अस्थायी खुशी, समाज जीवन में, वे तो बस पानी की बूंद की तरह हैं । तो जो दार्शनिक हैं, जिन्होंने वास्तव में दुनिया की स्थिति का अध्ययन किया है, वे समझ सकते हैं कि "यह चंचल खुशी मुझे खुश नहीं कर सकती है ।" फिर वे कहते हैं, कमल-दल-जल, जीवन तलमल । कमल-दल-जल का मतलब है लिली, लिली का फूल । तुम सभी नें झीलों पर कमल के फूल देखा है । वे ढुलमुल रहे हैं, हमेशा पानी में । ढुलमुल । किसी भी तरह, किसी भी समय, यह डूब सकते हैं । इसी प्रकार, यह जीवन खतरे में है हमेशा, हमेशा खतरे से भरा है । किसी भी पल यह समाप्त हो सकता है । इतने सारे उदाहरण हैं । लोग इसे देखते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं । यह अद्भुत बात है । वे हर दिन देख रहे हैं, हर पल, कि वह खुद खतरे मे हैं, दूसरे खतरे में हैं । फिर भी, वे सोचते हैं कि, "मैं सुरक्षित हूं" । यह स्थिति है ।